पंडित के बेटे से चंबल का डाकू बना जगन, आखिर जेल की बैरक में खत्म हुआ

चंबल 
कभी चंबल के बीहड़ों में बंदूक के दम पर अपना कानून चलाने वाला डाकू जगन गुर्जर अब सिर्फ एक फाइल, एक आपराधिक इतिहास और एक अधूरी कहानी बनकर रह गया है। 29 जून को अजमेर हाई सिक्योरिटी जेल की बैरक में उसकी हत्या के साथ उस शख्स का अंत हो गया, जिसका नाम तीन राज्यों की पुलिस के लिए सालों तक चुनौती बना रहा। यह वही जगन गुर्जर था, जिसके एनकाउंटर की मांग देश की संसद तक पहुंची थी। लेकिन विडंबना देखिए, जो कभी लाखों के इनामी डाकू के रूप में पहचाना जाता था, वही बाद के वर्षों में 3 रुपए के खुले पैसों और पंचर ठीक से नहीं बनाने जैसी मामूली बातों पर झगड़ा करने लगा था।

पंडित का बेटा कैसे बन गया चंबल का डाकू
जगन गुर्जर की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं रही। धौलपुर जिले के डांग क्षेत्र के भवुतीपुरा गांव में जन्मे जगन का बचपन बेहद साधारण था। उसके पिता शिवचरण गुर्जर मंदिर में पूजा-पाठ करते थे और परिवार दूध बेचकर भी गुजर-बसर करता था। लेकिन एक विवाद ने उसकी जिंदगी की दिशा ही बदल दी। मंदिर कमेटी से हुए झगड़े के बाद पुलिस से बचने के लिए वह बीहड़ों में भागा और फिर कभी सामान्य जिंदगी में लौट नहीं सका।

20 साल की उम्र में अपराध की दुनिया में एंट्री
साल 1994 में महज 20 साल की उम्र में उसके खिलाफ पहला मामला दर्ज हुआ। इसके बाद उसने अपराध की दुनिया में ऐसा कदम रखा कि पीछे मुड़कर नहीं देखा। पहले डकैत मोहन गुर्जर के गिरोह में शामिल हुआ और फिर अपने ही गुरु तथा जीजा के हत्यारों की हत्या कर खुद अलग गैंग बना ली। धीरे-धीरे राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के चंबल क्षेत्र में उसका नाम खौफ का पर्याय बन गया। हत्या, अपहरण, फिरौती, डकैती और लूट जैसे 125 से अधिक मुकदमे उसके नाम दर्ज हुए।

जब संसद में गूंजी एनकाउंटर की मांग
उसका आतंक इतना बढ़ गया कि साल 2019 में नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल ने संसद में खड़े होकर उसके एनकाउंटर की मांग की। संसद में उन्होंने कहा था कि जगन गुर्जर जैसे खूंखार अपराधी के कारण लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं और केंद्र सरकार को इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए। किसी डाकू के खिलाफ संसद में इस तरह एनकाउंटर की मांग उठना अपने आप में असाधारण घटना थी।

एनकाउंटर का डर, इसलिए करता रहा सरेंडर
लेकिन जितना बड़ा उसका आतंक था, उतना ही बड़ा उसके भीतर एनकाउंटर का डर भी था। पुलिस का दबाव बढ़ता तो वह आत्मसमर्पण कर देता। साल 2001 में उसने पहली बार धौलपुर के तत्कालीन एसपी बीजू जॉर्ज जोसफ के सामने सरेंडर किया। जेल से बाहर आया तो फिर अपराध में लौट गया। 2009 में कांग्रेस नेता सचिन पायलट की मौजूदगी में दूसरी बार आत्मसमर्पण किया। इसके बाद भी कोई बदलाव नहीं आया। तीसरी बार 2018 में तत्कालीन आईजी मालिनी अग्रवाल के सामने हथियार डाल दिए। पूछताछ में उसने माना था कि बीहड़ों की जिंदगी, गंदा पानी और लगातार भागते रहने की थकान ने उसे आत्मसमर्पण के लिए मजबूर किया।

बेटी की कसम भी नहीं बदल सकी आदत
सरेंडर के बाद कुछ समय ऐसा भी आया जब लगा कि शायद जगन बदल जाएगा। उसने अपनी बेटी की शादी में अपराध छोड़ने की कसम भी खाई। पत्नी को चुनाव भी लड़वाया, लेकिन हार के बाद फिर हथियार उठा लिए। इसके बाद उसका व्यवहार और ज्यादा अस्थिर होता गया। साल 2019 में वह महज 3 रुपए के खुले पैसों को लेकर दुकानदार से भिड़ गया। दूसरी बार पंचर ठीक से नहीं बनाने पर विवाद कर बैठा। छोटी-छोटी बातों पर हिंसक हो जाना उसकी पहचान बन चुका था।

आतंक से बहिष्कार तक का सफर
इसी दौरान उसने दो महिलाओं के साथ अमानवीय मारपीट कर उन्हें निर्वस्त्र घुमाने जैसी वारदात को अंजाम दिया, जिससे पूरे प्रदेश में आक्रोश फैल गया। कभी धौलपुर महल को उड़ाने की धमकी देने वाला यही डाकू बाद में मीडिया के सामने यह शिकायत करता नजर आया कि उसे मनरेगा में भी काम नहीं मिल रहा और समाज ने पूरी तरह बहिष्कृत कर दिया है। उसने तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और डीजीपी को पत्र लिखकर अपनी और परिवार की सुरक्षा की गुहार भी लगाई थी।

एक दौर ऐसा जब गांवों में नहीं बजी शहनाई
एक समय ऐसा भी था जब उसके डर से गांवों में शादियां तक रुक गई थीं। खुद उसके गांव में लगभग दस साल तक कोई बारात नहीं आई। उसके आतंक का असर सिर्फ पुलिस रिकॉर्ड तक सीमित नहीं था, बल्कि आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर भी साफ दिखाई देता था।

जेल की बैरक में खत्म हुआ चंबल का अध्याय
आखिरकार 29 जून को अजमेर हाई सिक्योरिटी जेल की बैरक में उसकी कहानी खत्म हो गई। आरोप है कि भरतपुर के कुलदीप जघीना हत्याकांड के आरोपी विष्णु ने तौलिए से गला दबाकर उसकी हत्या कर दी। जिस व्यक्ति ने तीन दशक तक पुलिस, प्रशासन और कानून व्यवस्था को चुनौती दी, उसका अंत जेल की चारदीवारी के भीतर हुआ।

खौफ, बंदूक और दर्दनाक अंजाम
जगन गुर्जर की जिंदगी यह बताती है कि अपराध की दुनिया में बंदूक भले कुछ समय के लिए ताकत दे दे, लेकिन उसका अंजाम अक्सर अकेलापन, डर और हिंसक मौत ही होता है। चंबल के बीहड़ों का यह चर्चित नाम अब इतिहास का हिस्सा बन चुका है, लेकिन उसके अपराधों की दहशत और उसके जीवन का विरोधाभास लंबे समय तक याद किया जाता रहेगा।

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