भोजशाला में प्रवेश और नमाज को लेकर नया विवाद, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद धार प्रशासन इंतजार में

धार 

 इं प्रदेश के धार में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला के विवाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मस्जिद पक्ष के लिए अंतरिम रूप से अलग स्थान पर नमाज की व्यवस्था करने के निर्देश के बाद अब सबसे बड़ी चर्चा वैकल्पिक स्थान को लेकर शुरू हो गई है। जिला प्रशासन ने अभी स्थान चयन की प्रक्रिया शुरू नहीं की है, लेकिन मंदिर पक्ष ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि भोजशाला के 300 मीटर के संरक्षित दायरे के भीतर नमाज की व्यवस्था स्वीकार नहीं होगी। इस सीमा के बाहर उपयुक्त भूमि या स्थान उपलब्ध कराए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है।

जिला प्रशासन को आदेश की प्रति का इंतजार
उधर, जिला प्रशासन का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने और उसके अध्ययन के बाद ही आगे की कार्रवाई शुरू की जाएगी। बता दें, सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अंतरिम आदेश में मस्जिद को परिसर के पास शुक्रवार की नमाज के लिए वैकल्पिक खुली जगह देने को कहा था।

भोजशाला मुक्ति यज्ञ के संयोजक गोपाल शर्मा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के निर्णय पर रोक नहीं लगाई है। भोजशाला का 300 मीटर का संरक्षित क्षेत्र है और यदि इस सीमा के बाहर मुस्लिम समाज को भूमि उपलब्ध कराई जाती है तो मंदिर पक्ष को कोई आपत्ति नहीं होगी।

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट पूर्व फैसले में भोजशाला को मंदिर मानते हुए हिंदू पक्ष को पूरे वर्ष पूजा-अर्चना का अधिकार दे चुका है। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि एक ही परिसर में दोनों धार्मिक गतिविधियां कैसे संचालित होंगी? नमाज किस खुले स्थान पर होगी, नमाजी किस रास्ते से आएंगे, श्रद्धालुओं की आवाजाही कैसे जारी रहेगी और एक ही मुख्य प्रवेश द्वार पर सुरक्षा व्यवस्था कैसे संभाली जाएगी?

फिलहाल प्रशासन ने इस संबंध में कोई आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की है और न्यायालय के आदेश का अध्ययन कर विस्तृत कार्ययोजना तैयार की जा रही है।

मंदिर पक्ष का यह सुझाव
गोपाल शर्मा ने सुझाव देते हुए बताया कि वर्ष 1938 में तत्कालीन शासक ने नमाज के लिए वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराई थी, जिस पर बाद में रहमत मस्जिद का निर्माण हुआ इसलिए आज भी भूमि का अभाव नहीं है। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, आदेश की प्रति मिलने के बाद राजस्व, पुलिस और अन्य विभागों की संयुक्त टीम भोजशाला और आसपास के क्षेत्र का निरीक्षण करेगी। इसके बाद ही यह तय होगा कि कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप नमाज के लिए कौन-सा स्थान उपयुक्त रहेगा। किसी भी अधिकारी ने इस संबंध में आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है।

भोजशाला परिसर में जाने एक ही मुख्य द्वार
 भोजशाला परिसर में वर्तमान में केवल एक ही मुख्य प्रवेश द्वार है। यहीं पर पुलिस की स्थायी चौकी स्थापित है, जहां सुरक्षा जांच के बाद श्रद्धालुओं को परिसर में प्रवेश दिया जाता है। सामान्य दिनों में दर्शन और पूजा के बाद श्रद्धालु इसी मार्ग से बाहर निकलते हैं।

हालांकि, बसंत पंचमी जैसे बड़े आयोजनों में हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए प्रशासन वैकल्पिक निकास व्यवस्था लागू करता है। ऐसे अवसरों पर भोजशाला परिसर के बाईं ओर बने छोटे निकास द्वार से श्रद्धालुओं को बाहर निकाला जाता है।

वहां से श्रद्धालु सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए दाईं ओर बढ़ते हैं और मुख्य प्रवेश द्वार के पास स्थित पुलिस चौकी के समीप से बाहर निकलते हैं, जिससे मुख्य प्रवेश मार्ग पर दबाव कम किया जा सके।

बसंत पंचमी और शुक्रवार आने पर हमेशा चुनौती
 भोजशाला के इतिहास में कई बार बसंत पंचमी और शुक्रवार एक ही दिन पड़े हैं। ऐसे अवसरों पर प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ओर हजारों हिंदू श्रद्धालुओं की पूजा-अर्चना और दूसरी ओर मुस्लिम समाज की जुम्मे की नमाज को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराना रही है।

ऐसे संवेदनशील अवसरों पर जिला प्रशासन, पुलिस, एएसआई तथा दोनों समुदायों के प्रतिनिधियों के साथ कई दौर की बैठकें आयोजित होती रही हैं। सुरक्षा व्यवस्था, प्रवेश-निकास, बैरिकेडिंग और समय निर्धारण को लेकर विस्तृत प्लान तैयार किए जाते रहे हैं।

आदेश के अध्ययन के बाद बनेगी रणनीतिः मुस्लिम पक्ष
उधर, शहर काजी वकार सादिक ने कहा कि आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के बाद मस्जिद कमेटी, वरिष्ठ समाजजन और शुक्रवार की नमाज अदा करने वाले लोगों की बैठक होगी। आदेश का अध्ययन करने के बाद प्रशासन से चर्चा कर रणनीति तय की जाएगी।

चर्चा में 13 बीघा भूमि
राजस्व अभिलेखों के अनुसार, भोजशाला
के आसपास लगभग 13 बीघा भूमि मस्जिद पक्ष की संस्थाओं के नाम दर्ज बताई जा रही है। दावा है कि इनमें उर्स कमेटी और बाबा कमाल मौला से संबंधित भूमि भी शामिल है। ऐसे में यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि क्या प्रशासन इसी भूमि को संभावित विकल्प के रूप में देखेगा या किसी अन्य जमीन की तलाश करेगा।

कब-कब बदला भोजशाला में जाने का रास्ता

2006 में पहली बार बनाई वैकल्पिक व्यवस्था

    वर्ष 2006 में पहली बार बसंत पंचमी और शुक्रवार एक साथ पड़े थे। उस समय मुख्य प्रवेश द्वार पर हजारों हिंदू श्रद्धालु मौजूद थे और निर्धारित समय पर मुस्लिम समाज को जुम्मे की नमाज भी अदा करनी थी। भीड़ और सुरक्षा को देखते हुए प्रशासन ने मुस्लिम नमाजियों को भोजशाला के पीछे स्थित लकड़ी पीठ क्षेत्र की ओर से प्रवेश कराया।

    वहां से उन्हें सुरक्षा घेरे में मुख्य परिसर तक पहुंचाया गया। उस दौरान वैकल्पिक व्यवस्था के तहत अस्थायी सीढ़ी भी लगाई गई थी, ताकि दोनों समुदायों के धार्मिक कार्यक्रम अलग-अलग व्यवस्था के साथ शांतिपूर्वक संपन्न हो सकें।

2013 में भी अपनाई गई वैकल्पिक व्यवस्था साल 2013 में भी बसंत पंचमी और शुक्रवार एक ही दिन पड़े। उस समय भी प्रशासन ने लगभग इसी प्रकार की व्यवस्था अपनाई। मुस्लिम नमाजियों को पीछे के मार्ग से परिसर तक पहुंचाया गया, जबकि दूसरी ओर हिंदू श्रद्धालुओं की पूजा-अर्चना निर्धारित समय के अनुसार जारी रही। पूरे परिसर में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रखी गई थी।

जनवरी 2026: पीछे के खुले हिस्से में कराई गई नमाज 23 जनवरी 2026 को बसंत पंचमी और शुक्रवार एक साथ होने पर न्यायालय के निर्देशों के अनुसार हिंदू पक्ष की पूजा पूरे दिन जारी रही। वहीं मुस्लिम समाज के लिए अलग व्यवस्था बनाई गई। प्रशासन ने मुख्य प्रवेश द्वार के पास स्थित अंदरूनी मार्ग से सीमित संख्या में नमाजियों को परिसर तक पहुंचाया।

चूंकि पूजा लगातार चल रही थी, इसलिए भोजशाला के पीछे स्थित खुले हिस्से में अस्थायी टेंट लगाकर जुम्मे की नमाज अदा कराई गई थी।

हालांकि, इस व्यवस्था का मुस्लिम समाज ने विरोध किया था। उनका कहना था कि उन्हें भोजशाला परिसर के भीतर निर्धारित स्थान पर नमाज नहीं कराई गई, बल्कि जिस स्थान पर नमाज कराई गई वह कब्रिस्तान का हिस्सा है, जहां धार्मिक मान्यता के अनुसार नमाज अदा नहीं की जाती।

भोजशाला परिसर में नमाज कहां होगी अभी इसकी जानकारी नहीं है।

जहां पहले नमाज हुई वो एरिया कब्रिस्तान का हिस्सा मुस्लिम पक्ष ने कहा है कि पूर्व में पीछे के खुले हिस्से में कराई गई नमाज का उन्होंने विरोध किया था। उनका तर्क था कि वह स्थान कब्रिस्तान का हिस्सा है, जहां धार्मिक मान्यता के अनुसार नमाज अदा नहीं की जाती।

अयोध्या से ऐसे अलग भोजशाला का मामला
नौ नवंबर, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद में अं
तिम फैसला सुनाते हुए मंदिर निर्माण के साथ सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को मस्जिद के लिए पांच एकड़ वैकल्पिक भूमि देने का निर्देश दिया था। इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने धन्नीपुर गांव में पांच एकड़ भूमि आवंटित की। भोजशाला मामला अलग है। यहां सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम फैसला नहीं दिया है। मामला अभी विचाराधीन है।

    हम सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से संतुष्ट हैं। हमारी ओर से अधिवक्ताओं ने कोर्ट में मजबूत और प्रभावी पक्ष रखा। आदेश अनुसार हमें नमाज के लिए स्थान उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
    – अब्दुल समद, सदर, कमाल मौला वेलफेयर सोसाइटी, धार

 

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