AI की रफ्तार रोकने का आरोप, Anthropic-OpenAI समेत 4 कंपनियों पर अमेरिका में मुकदमा

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की रफ्तार रोकने की बात अब सिर्फ बहस तक नहीं रही, मामला कोर्ट पहुंच गया है. अमेरिका में Anthropic, OpenAI, Google और SpaceXAI के खिलाफ मुकदमा दायर किया गया है. आरोप है कि इन बड़ी AI कंपनियों ने मिलकर AI के विकास की रफ्तार कम करने पर सहमति बनाई. अगर ये आरोप साबित होते हैं, तो मामला अमेरिकी एंटीट्रस्ट कानूनों के तहत गंभीर हो सकता है.

एआई को लेकर अब तक सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की रही है कि इसे कितना तेज बनाया जाए. लेकिन अब सवाल उल्टा हो गया है. क्या AI को जानबूझकर स्लो करने की कोशिश भी कंपनियों के लिए कानूनी मुसीबत बन सकती है? अमेरिका में दायर एक नए मुकदमे में Anthropic, OpenAI, Google और SpaceXAI पर यही आरोप लगाया गया है.

मामला अमेरिका के नॉर्दर्न डिस्ट्रिक्ट ऑफ कैलिफोर्निया की कोर्ट में पहुंचा है. मुकदमा उन लोगों की तरफ से दायर किया गया है, जो ChatGPT, Claude, Grok और Gemini जैसी AI सर्विस के पेड यूजर हैं.

एक पोस्ट से शुरू हुआ पूरा विवाद
इस मामले की शुरुआत 12 सितंबर को एंथ्रोपिक के CEO Dario Amodei के एक सोशल मीडिया पोस्ट से हुई. अमोदेई ने एआई के तेजी से बढ़ते विकास को लेकर चिंता जताई और कहा कि कंपनियों को AI को ज्यादा सावधानी और सेफ्टी के साथ आगे बढ़ाना चाहिए.

उनकी बात का मतलब था कि AI की रफ्तार इतनी तेज हो रही है कि उसकी सेफ्टी को लेकर भी ज्यादा तैयारी जरूरी है. उन्होंने AI कंपनियों के बीच सुरक्षा से जुड़े मामलों में कोलैबोरेशन की जरूरत की बात भी कही.

इसके बाद OpenAI के CEO Sam Altman, SpaceXAI के Elon Musk और Google DeepMind के Demis Hassabis ने भी अमोदेई के प्रपोजल पर सार्वजनिक तौर पर रिएक्शन दिया. मुकदमा करने वालों का दावा है कि इन बयानों से पता चलता है कि बड़ी एआई कंपनियां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की रफ्तार कम करने के मुद्दे पर एक-दूसरे के साथ तालमेल कर रही थीं.

यूजर्स को क्या नुकसान होने का दावा?
मुकदमे में सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसे एआई कंपनियों के कॉम्पिटिटर्स ने नहीं, बल्कि उनके पेड यूजर्स ने दायर किया है.
पिटीशनर्स का कहना है कि अगर ChatGPT, Claude, Grok और Gemini जैसी सर्विसेज को बेहतर बनाने की रफ्तार कंपनियां मिलकर कम करती हैं, तो इसका सीधा असर यूजर्स को मिलने वाली सर्विस पर पड़ सकता है.

उनका तर्क है कि अगर कोई एक कंपनी खुद अपनी AI डेवलपमेंट की रफ्तार कम करती है तो उसे बाकी कंपनियों से पीछे रहने का खतरा होगा. लेकिन अगर सभी बड़ी कंपनियां मिलकर ऐसा करें, तो मार्केट में कॉम्पिटिशन कम हो सकता है. हालांकि, यहां एक बात साफ समझना जरूरी है. अभी ये सिर्फ मुकदमे में लगाए गए आरोप हैं. कोर्ट ने इन आरोपों को सही साबित नहीं किया है.

खुद एंथ्रोपिक ने भी उठाई थी एंटीट्रस्ट की बात
इस पूरे मामले का एक दिलचस्प पहलू यह है कि एंथ्रोपिक के सीईओ डारियो अमोदेई ने अपने प्रपोजल में खुद भी एंटीट्रस्ट से जुड़ी चिंता का जिक्र किया था. उन्होंने सुझाव दिया था कि अमेरिकी सरकार एआई कंपनियों के बीच सेफ्टी से जुड़ी बातचीत को आसान बनाने में मदद कर सकती है. इसके लिए कुछ खास तरह की सेफ्टी बातचीत को लेकर सीमित कानूनी छूट की जरूरत हो सकती है.

Sam Altman ने भी ऐसे सरकारी फ्रेमवर्क का समर्थन किया था, जिसमें एआई सेफ्टी को लेकर कंपनियों के लिए एक जैसे नियम हों. हालांकि उनका कहना था कि AI सेफ्टी पर काम शुरू करने के लिए किसी नई एंटीट्रस्ट छूट या कानून का इंतजार जरूरी नहीं है.

अब कोर्ट के सामने बड़ा सवाल
अब इस केस में असली सवाल यही है कि एआई कंपनियों का सेफ्टी के लिए साथ काम करना कहां तक सही है. AI कंपनियां अगर अलग-अलग अपने मॉडल की सेफ्टी बढ़ाती हैं, तो यह एक बात है. लेकिन अगर कम्पेटिटर कंपनियां मिलकर एआई के विकास की रफ्तार कम करने पर सहमत होती हैं, तो अमेरिकी एंटीट्रस्ट कानून इसे किस नजर से देखता है, यही इस केस का अहम मुद्दा बन गया है.

फिलहाल मामला शुरुआती स्टेज में है. एंथ्रोपिक, ओपनएआई, गूगल और स्पेसएक्स एआई के रेप्रेसेंटेटिव ने शनिवार तक इस मुकदमे पर तुरंत कोई जवाब नहीं दिया था. अब आगे कोर्ट में यह तय होना है कि कंपनियों का दावा किया गया सहयोग AI की सुरक्षा के लिए था या फिर इससे मार्केट में कम्पटीशन पर असर पड़ सकता है.

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