सूडान की भयानक भूख: जब जंगली घास और कोयला ही बना जीवन का सहारा

खारर्तूम 

सूडान में जारी गृहयुद्ध के बीच लोग जिंदा रहने के लिए काफी जद्दोजहद कर रहे हैं. यहां सिर्फ सेना और विद्रोही अर्धसैनिक बलों की गोलियों से बचना भर ही जीवित रहने की शर्त नहीं है. भुखमरी और अकाल भी लोगों को धीरे-धीरे मार रही है. हालात ऐसे हो गए हैं कि लोग अपनी भूख मिटाने के लिए घास और खरपतवार खाने को मजबूर हो रहे हैं.  

एक रिपोर्ट के मुताबिक, सूडान के कई इलाकों में भूखमरी का आलम ऐसा है कि लोग जंगली पौधों और खरपतवारों को नमक के साथ उबाल कर अपने बच्चों को पिला रहे हैं, ताकि उनकी भूख शांत हो सके. पूरा देश विनाशकारी युद्ध और व्यापक भूख से जूझ रहा है.

जंगली घास बन रहा लोगों का सहारा
भोजन के लिए संघर्ष कर रहे लोगों में 60 वर्षीय सेवानिवृत्त एक स्कूल शिक्षक ने अपना नाम नहीं छापने की शर्त पर यहां के हालात की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि सूडान में लोगों को खाना नहीं मिल रहा है. लोग अपनी भूख मिटाने के लिए अब घास और जंगली पौधों पर निर्भर हो गए हैं. खदीजा कोरो नामक एक पौधा इन दिनों भूखे लोगों के लिए बड़ा सहारा बन गया है. 

इस शिक्षक ने इस पौधे के लिए एक  कविता भी लिखी है. अपनी कविता के जरिए इस जंगली घास के प्रति आभार व्यक्त किया है, जो यहां लोगों की लाइफलाइन बन चुकी है. उन्होंने कहा कि ये हमारे लिए एक मरहम है जो भय के बीच कई लोगों को भूख से मरने से बचाता है.

दो करोड़ से ज्यादा लोग भुखमरी की चपेट में 
ये रिटायर्ड शिक्षक सूडान में 24.6 मिलियन लोगों में से एक हैं, जो गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं. इतने सारे लोग इस देश की आबादी का आधा हिस्सा हैं. सूडान अप्रैल 2023 से संघर्ष में उलझा है. जब सूडानी सेना और अर्धसैनिक रैपिड सपोर्ट फोर्सेज (आरएसएफ) के बीच तनाव पूर्ण पैमाने पर लड़ाई में बदल गया.

एक करोड़ से ज्यादा लोग हुए हैं विस्थापित
शुरुआत में ये संघर्ष राजधानी खार्तूम में शुरू हुआ और फिर पूरे देश में फैल गया. युद्ध में 20,000 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है. युद्ध की वजह से लगभग 1 करोड़ 30 लाख  लोग विस्थापित हुए हैं. इसके साथ ही जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा अकाल की चपेट में है. इन दिनों सूडान पर विश्व का सबसे बड़ा हंगर क्राइसिस मंडरा रहा है. 

सहायता संगठनों की रिपोर्ट है कि संघर्ष के कारण बाजार में खाद्य सामग्री की कीमतें आसमान छू रही हैं. सहायता वितरण में भारी बाधा आ रही है तथा एक ऐसे देश में कृषि भूमि में भारी कमी आई है, जिसे कभी वैश्विक अन्न भंडार माना जाता था.

कोर्डोफन, नुबा पर्वत और दारफुर जैसे क्षेत्रों में स्थिति विशेष रूप से गंभीर है. जहां एल फशेर और जमजम शिविर जैसे क्षेत्र नॉर्वेजियन शरणार्थी परिषद जैसे समूहों के लिए दुर्गम बने हुए हैं, जैसा कि पोर्ट सूडान में स्थित सहायता कार्यकर्ता मैथिल्डे वु ने पुष्टि की है.

कोयला चूसकर भूख मिटा रहे लोग
कुछ लोग दिन में केवल एक बार भोजन करके जीवित रह रहे हैं, जो प्रायः साधारण बाजरे का दलिया होता है. वहीं उत्तरी दारफुर में कुछ लोग अपनी भूख मिटाने के लिए कोयला चूसने पर भी निर्भर हैं.

 संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने सूडानी सैन्य नेता जनरल अब्देल-फतह बुरहान को फ़ोन किया और उनसे एल फशर में एक हफ़्ते के लिए युद्धविराम की मांग की ताकि सहायता पहुंचाई जा सके. सेना के एक बयान के अनुसार, बुरहान इस अनुरोध पर सहमत हो गए, लेकिन यह अभी तय नहीं है कि आरएसएफ इस युद्धविराम पर सहमत होगा या नहीं.

विद्रोही सेना के कब्जे वाले इलाके अकालग्रस्त
सूडान के कृषि मंत्री अबू बक्र अल-बशारी ने अप्रैल में अल-हदाथ समाचार चैनल को बताया कि देश में अकाल के कोई संकेत नहीं हैं, लेकिन आरएसएफ के नाम से जाने जाने वाले अर्धसैनिक बलों द्वारा नियंत्रित क्षेत्रों में खाद्य आपूर्ति की कमी है.

विश्व खाद्य कार्यक्रम, सूडान की प्रवक्ता लेनी किन्जली ने बताया कि गेजेरा के 17 इलाके, दारफ़ूर क्षेत्र का अधिकांश हिस्सा और खार्तूम, जिसमें जेबेल औलिया भी शामिल है, अकाल की चपेट में है. किन्जली ने बताया कि हर महीने 40 लाख से ज़्यादा लोग समूह से सहायता प्राप्त करते हैं, जिनमें से 17 लाख लोग अकालग्रस्त या जोखिम वाले इलाकों में रहते हैं.

सूडान में दो मोर्चों पर हो रहा संघर्ष
सूडान में दो-दो संगठनों से सेना का संघर्ष चल रहा है. एक रैपिड सपोर्ट फोर्सेस और सेना के बीच और दूसरा पीपुल्स लिबरेशन मूवमेंट-नॉर्थ के साथ, जो सेना के खिलाफ लड़ रहे हैं. साथ ही इनका आरएसएफ के साथ संबंध है, जिसके कारण भोजन, स्वच्छ पानी या दवा तक पहुंच लगभग असंभव हो गई है.

रैपिड सपोर्ट फोर्सेस द्वारा सड़कें अवरुद्ध किए जाने के कारण लोग अपने परिवार से मिलने के लिए उत्तरी कोर्डोफ़ान के ओबैद नहीं जा सकते. सहायताकर्मियों के अनुसार, हिंसा और लूटपाट ने यात्रा को असुरक्षित बना दिया है. जिससे निवासियों को अपने आस-पड़ोस में ही रहना पड़ रहा है और उनके लिए भोजन तक पहुंच सीमित हो गई है.

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