जापान के वैज्ञानिकों का चमत्कार: मामूली लोहा से अरबों रुपये बचाने का तरीका, पेट्रोल-डीजल की समस्या का हल

नई दिल्ली
 दुनियाभर में क्लीन एनर्जी की तलाश तेज हो रही है. हाइड्रोजन को भविष्य का सबसे साफ ईंधन माना जाता है. अभी तक हाइड्रोजन बनाने की प्रक्रिया काफी महंगी और जटिल रही है. लेकिन जापान के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा तरीका खोज निकाला है जो यकीन करने में भी मुश्किल लगता है. उन्होंने सिर्फ लोहे के आयन और अल्ट्रावायलेट (UV) रोशनी की मदद से हाइड्रोजन तैयार कर ली है. रिपोर्ट के अनुसार, क्यूशू यूनिवर्सिटी के फैकल्टी ऑफ इंजीनियरिंग के एसोसिएट प्रोफेसर ताकाहिरो मात्सुमोतो और उनकी टीम एक रिसर्च कर रही थी. उनका मकसद सस्ते तत्वों से कैटलिस्ट यानी उत्प्रेरक तैयार करना था. इसी दौरान एक कंट्रोल एक्सपेरिमेंट में उन्होंने मेथेनॉल, आयरन आयन और सोडियम हाइड्रोक्साइड को मिलाया. जब इस घोल पर अल्ट्रावायलेट लाइट डाली गई, तो जो हुआ उसने सबको हैरान कर दिया. इस मिश्रण से बड़ी मात्रा में हाइड्रोजन गैस निकलने लगी। 

मात्सुमोतो कहते हैं, ‘शुरुआत में तो इस पर यकीन करना ही मुश्किल था.‘ उन्होंने इसे एक सुखद इत्तेफाक बताया जिसने विज्ञान की नई राह खोल दी। 

हाइड्रोजन उत्पादन की यह नई तकनीक इतनी खास क्यों है?
आजकल ज्यादातर हाइड्रोजन फॉसिल फ्यूल यानी जीवाश्म ईंधन से बनाई जाती है. इससे पर्यावरण पर बुरा असर पड़ता है. हाइड्रोजन को मेथेनॉल जैसे अल्कोहल से भी निकाला जा सकता है, लेकिन इसके लिए बहुत महंगे और दुर्लभ मेटल्स वाले कैटलिस्ट की जरूरत पड़ती है. लोहा पृथ्वी पर सबसे ज्यादा पाया जाने वाला और सस्ता मेटल है. इस नई रिसर्च में लोहे का इस्तेमाल करके उसी रफ्तार से हाइड्रोजन बनाई गई, जितनी महंगे कैटलिस्ट से बनती है. वैज्ञानिकों ने पाया कि इसकी हाइड्रोजन उत्पादन दर 921 मिलीमोल प्रति घंटा प्रति ग्राम कैटलिस्ट रही, जो अब तक के सबसे बेहतरीन सिस्टम के बराबर है। 

क्या सिर्फ मेथेनॉल से ही हाइड्रोजन बनाई जा सकती है?
इस रिसर्च की सबसे बड़ी खूबी इसकी वर्सेटिलिटी है. वैज्ञानिकों ने टेस्ट किया और पाया कि यह तरीका सिर्फ मेथेनॉल तक सीमित नहीं है. इससे एथेनॉल और प्रोपेनॉल जैसे दूसरे अल्कोहल से भी हाइड्रोजन निकाली जा सकती है. इसके अलावा, बायोमास से जुड़ी चीजों जैसे ग्लूकोज, स्टार्च और सेल्युलोज से भी हाइड्रोजन बनाने में सफलता मिली है. हालांकि, अभी ग्लूकोज जैसी चीजों के साथ इसकी परफॉर्मेंस थोड़ी कम है, लेकिन भविष्य में इसे बेहतर बनाने की पूरी गुंजाइश है. यह तकनीक कचरे से ऊर्जा बनाने की दिशा में भी बड़ा कदम साबित हो सकती है। 

क्या इस पूरी प्रक्रिया में कोई बड़ी चुनौती भी है?
हर बड़ी खोज के साथ कुछ सवाल भी जुड़े होते हैं. मात्सुमोतो की टीम का कहना है कि वे अभी तक इस पूरी रिएक्शन के सटीक मैकेनिज्म को नहीं समझ पाए हैं. यानी यह प्रक्रिया अंदरूनी तौर पर कैसे काम करती है, इसकी बारीकियां पता लगाना बाकी है. इसके अलावा अन्य पदार्थों के साथ इसकी एफिशिएंसी को बढ़ाना भी एक चुनौती है. फिर भी, यह तकनीक इतनी सरल है कि इसे कोई भी दोहरा सकता है. प्रोफेसर मात्सुमोतो कहते हैं कि वह चाहते हैं कि बच्चे भी इसे ट्राई करें ताकि वे साइंस की तरफ आकर्षित हों। 

भविष्य की क्लीन एनर्जी के लिए यह कितना बड़ा बदलाव है?
हाइड्रोजन का इस्तेमाल जब ईंधन के तौर पर होता है, तो कार्बन डाइऑक्साइड नहीं निकलती. यह सिर्फ पानी की भाप छोड़ता है. अगर इस नई और सस्ती विधि को बड़े पैमाने पर लागू किया गया, तो हाइड्रोजन कार और पावर प्लांट्स को चलाना बहुत सस्ता हो जाएगा. लोहे जैसे सस्ते मेटल और रोशनी का इस्तेमाल सस्टेनेबिलिटी की दिशा में मील का पत्थर है. आने वाले समय में ऑप्टिमाइजेशन के जरिए इस तकनीक को और बेहतर बनाया जाएगा. यह खोज हमें फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता कम करने और ग्लोबल वार्मिंग से लड़ने में बड़ी मदद दे सकती है। 

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