सनातन परंपरा, लोक मान्यताओं और तांत्रिक धारणाओं में कुत्ता यानी श्वान को साधारण जीव नहीं माना गया है. विशेष रूप से भगवान भैरव के वाहन के रूप में कुत्ते का उल्लेख मिलता है. मान्यता है कि जिस घर के द्वार पर कोई कुत्ता नियमित रूप से आकर बैठता है, वह केवल आश्रय लेने नहीं आता है, बल्कि उस स्थान की सूक्ष्म ऊर्जा से भी जुड़ जाता है. कई परंपराओं में इसे घर की सुरक्षा, नकारात्मक शक्तियों से रक्षा और आने वाले संकटों के संकेत से जोड़ा जाता है. आइए इसका जवाब पंडित श्रीपति त्रिपाठी जी से जानते हैं.
कुत्ते का घर के बाहर बैठने का संकेत
शकुन शास्त्र के अनुसार, कभी-कभी ऐसा कुत्ते पिछले जन्म के किसी आत्मीय संबंधी, मित्र या पूर्वज की चेतना से भी जुड़ा माना जाता है, जो किसी कारणवश उस परिवार के प्रति विशेष लगाव रखता है. कहा जाता है कि वह परिवार के दुख-कष्ट और ग्रहों के अशुभ प्रभावों को अपने ऊपर लेने का प्रयास करता है तथा घर के चारों ओर एक अदृश्य सुरक्षा कवच निर्मित करता है. इसी कारण शास्त्रीय परंपराओं में श्वान यानी कुत्ते को भोजन कराना, जल देना और उसके प्रति दया भाव रखना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है. विशेषकर शनिवार और भैरव उपासना में काले श्वान को रोटी खिलाने का विधान भी बताया गया है.
कुत्ते को न करें नजरअंदाज
हालांकि, यह ध्यान रखना आवश्यक है कि वंश विनाश, तत्काल पुण्य नाश या किसी विशेष भयावह दंड जैसी बातें मुख्यतः लोक मान्यताओं और जनश्रुतियों का हिस्सा हैं. शास्त्रों का मूल संदेश यह है कि किसी भी जीव पर अत्याचार करना पाप है और सभी जीवों के प्रति करुणा, सेवा और सम्मान ही सच्चा धर्म है.
इसलिए, यदि कोई श्वान आपके द्वार पर आता है, तो उसे प्रेम, दया और सम्मान की दृष्टि से देखें. कौन जाने वह केवल भोजन की तलाश में आया एक जीव हो या ईश्वर द्वारा भेजा गया करुणा और सेवा का एक अवसर. आखिर दया ही वह धर्म है, जो मनुष्य को देवत्व के सबसे निकट ले जाती है.
कुत्ते का पौराणिक महत्व
महाभारत के महाप्रस्थानिक पर्व में वर्णन मिलता है कि जब पांडव हिमालय की ओर प्रस्थान कर रहे थे, तब एक श्वान अंत तक धर्मराज युधिष्ठिर के साथ रहा. अंत में वही श्वान यानी कुत्ता धर्मदेव का रूप निकला. यह प्रसंग दर्शाता है कि युधिष्ठिर ने शरणागत का त्याग करने से इनकार किया, क्योंकि ऐसा करना धर्म के विरुद्ध है. यह कथा श्वान के प्रति करुणा, निष्ठा और धर्म पालन का संदेश देती है.

